Zoya Thomas Lobo: संघर्ष से सफलता तक – भारत की पहली ट्रांसजेंडर फोटो जर्नलिस्ट की प्रेरणादायक यात्रा

प्रस्तावना/परिचय
ज़ोया थॉमस लोबो सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, कला और अटूट मानवीय भावना की कहानी हैं। भारत की पहली ट्रांसजेंडर फोटो जर्नलिस्ट के रूप में, उन्होंने न केवल रूढ़ियों को तोड़ा है, बल्कि अपने लेंस के माध्यम से समाज को एक नया दृष्टिकोण दिया है। भीख माँगने से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपने काम के लिए पहचान बनाने तक, उनकी यात्रा लाखों लोगों के लिए एक मशाल है। यह लेख ज़ोया के जीवन के संघर्षों, फोटोग्राफी के प्रति उनके जुनून और समाज में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर एक विस्तृत नज़र डालता है।
प्रारंभिक जीवन और पहचान का संघर्ष
बचपन और पहचान
- ज़ोया का जन्म: मुंबई के माहिम में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन आर्थिक कठिनाइयों से भरा रहा।
- पिता का निधन: जब वह सिर्फ़ 11 साल की थीं, तब उनके पिता के आकस्मिक निधन ने परिवार को गहरे वित्तीय संकट में धकेल दिया।
- शिक्षा का छूटना: परिवार का सहारा बनने के लिए उन्हें पाँचवी कक्षा में ही स्कूल छोड़ना पड़ा और एक बेकरी और थिएटर में छोटे-मोटे काम करने पड़े।
- लिंग पहचान (Gender Identity) की आंतरिक लड़ाई: आर्थिक संघर्षों के बीच, ज़ोया अपनी लिंग पहचान को लेकर भी अंदरूनी लड़ाई लड़ रही थीं। जैविक रूप से पुरुष पैदा होने के बावजूद, उन्होंने धीरे-धीरे अपनी सच्ची पहचान एक महिला के रूप में स्वीकार की।
- सामाजिक अस्वीकृति: इस पहचान के कारण उन्हें समाज में मज़ाक और तिरस्कार का सामना करना पड़ा।
गुरु और समुदाय का समर्थन
- ट्रांसजेंडर समुदाय में प्रवेश: 17 साल की उम्र में, उन्हें अपनी ‘गुरु’ सलमा मिलीं, जिन्होंने उन्हें ट्रांसजेंडर समुदाय से परिचित कराया। इस समुदाय में ज़ोया को पहली बार स्वीकार्यता और अपनापन महसूस हुआ, और यहीं उन्हें ‘ज़ोया‘ नाम मिला।
- भीख माँगना: जीवित रहने और परिवार को सहारा देने के लिए, ज़ोया को मजबूरन मुंबई लोकल ट्रेनों में भीख माँगने का काम करना पड़ा। लगभग एक दशक तक, वह रोज़ ₹500 से ₹800 कमाकर गुज़ारा करती रहीं।

एक लेंस के माध्यम से नई मंज़िल

फोटोग्राफी की ओर पहला कदम
भीख माँगते हुए भी, ज़ोया के मन में कुछ बड़ा करने की इच्छा थी। उनकी ज़िंदगी में बड़ा मोड़ तब आया |
पहला कैमरा: उन्होंने भीख से जमा किए हुए लगभग ₹30,000 की बचत से मुंबई के CST बोरा बाज़ार से एक सेकेंड-हैंड कैमरा ख़रीदा। यह कैमरा सिर्फ़ एक उपकरण नहीं था, बल्कि दुनिया को देखने और अपनी कहानी कहने का उनका पहला साधन था।
पत्रकारिता में प्रवेश: YouTube पर एक शॉर्ट फ़िल्म पर टिप्पणी करने के बाद, उन्हें फ़िल्म के सीक्वल में अभिनय करने का मौका मिला। एक पुरस्कार समारोह में, एक मीडिया प्रतिनिधि ने उनके आत्मविश्वास को देखकर उन्हें रिपोर्टिंग की नौकरी की पेशकश की।
कैमरे से प्रेम: रिपोर्टिंग करते समय, ज़ोया को एहसास हुआ कि उनका असली जुनून लिखने में नहीं, बल्कि कैमरे के लेंस के माध्यम से वास्तविकता को कैद करने में है। उनके लिए, तस्वीर समाज की अनदेखी सच्चाइयों को सामने लाने का एक शक्तिशाली ज़रिया थी।
ऐतिहासिक मोड़: प्रवासी संकट की तस्वीरें
2020 का महत्वपूर्ण क्षण: अप्रैल 2020 में, लॉकडाउन के दौरान, ट्रेन से यात्रा करते समय उन्होंने बांद्रा स्टेशन के बाहर प्रवासी मज़दूरों को विरोध करते देखा।
साहसिक दस्तावेज़ीकरण: बिना किसी झिझक के, वह घर भागीं, अपना कैमरा लिया और उन मज़दूरों की पीड़ा और संघर्षों को कैद किया।
पहचान: उनकी इन मार्मिक तस्वीरों को कई मीडिया आउटलेट्स ने प्रकाशित किया। इस घटना ने उन्हें आधिकारिक तौर पर भारत की पहली ट्रांसजेंडर फोटो जर्नलिस्ट के रूप में स्थापित किया।
चुनौतियों का सामना और सफलता की पहचान
पेशागत संघर्ष और स्वीकार्यता
एक प्रतिभाशाली फोटो जर्नलिस्ट होने के बावजूद, ज़ोया को पेशेवर दुनिया में अपनी पहचान स्थापित करने में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा:
भेदभाव: ट्रांसजेंडर होने के कारण उन्हें कॉर्पोरेट जगत में उपेक्षा और पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा। उन्हें अक्सर पूर्णकालिक नौकरी के अवसरों से वंचित रखा गया।
लचीलापन: इन चुनौतियों के बावजूद, ज़ोया ने फ़्रीलांस काम करना जारी रखा। उन्होंने महामारी के दौरान टीकाकरण अभियान, खाली सड़कें और आम नागरिकों के लचीलेपन जैसे विषयों को कवर किया।
पुरस्कार और सहयोग: उनके काम को बॉम्बे न्यूज़ फ़ोटोग्राफ़र्स एसोसिएशन और 24 तास न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से पहचान मिली। उन्होंने Kay Beauty (कैटरीना कैफ़ का ब्रांड), Google India के #searchforchange और HSBC Pride जैसे बड़े अभियानों के लिए भी काम किया है।
सपनों और सामाजिक संदेश
ज़ोया का काम केवल एक पेशा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक मिशन है |
समानता की माँग: वह सहानुभूति नहीं, बल्कि सम्मान और समानता चाहती हैं। वह लगातार यह संदेश देती हैं कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति भी किसी अन्य इंसान की तरह सामान्य हैं और उन्हें बस मौका मिलना चाहिए।
माता-पिता के लिए संदेश: वह परिवारों से आग्रह करती हैं कि वे अपने बच्चों को, उनकी पहचान की परवाह किए बिना, समर्थन दें और उन्हें शिक्षित करें ताकि उन्हें भीख माँगने के लिए मजबूर न होना पड़े।
आगे के सपने: ज़ोया का एक व्यक्तिगत सपना है | जंगल में एक बाघ की तस्वीर खींचना। वह अपनी इस तस्वीर को विद्या बालन (उनकी फ़िल्म ‘शेरनी’ से प्रेरित) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उपहार में देना चाहती हैं।
ज़ोया: समाज के लिए एक दर्पण
निष्कर्ष
ज़ोया थॉमस लोबो की कहानी हमें याद दिलाती है कि प्रतिभा किसी भी पृष्ठभूमि से आ सकती है, लेकिन उसे पनपने के लिए समाज के सामूहिक समर्थन की आवश्यकता होती है। वह न केवल भारत की पहली ट्रांसजेंडर फोटो जर्नलिस्ट हैं, बल्कि हमारी सामाजिक पूर्वाग्रहों और मानवता का एक शक्तिशाली दर्पण हैं। अपने लेंस के माध्यम से, वह हर दिन न केवल कहानियाँ कैद कर रही हैं, बल्कि समावेशी और दयालु भविष्य की नींव भी रख रही हैं। उनकी यात्रा दर्शाती है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कला के माध्यम से सबसे कठिन बाधाओं को भी पार किया जा सकता है।



