एक ही ट्रैक पर 3 ट्रेनें, अभी बिलासपुर 4 नवंबर के दर्दनाक ट्रेन हादसे के मातम से उबरा भी नहीं था, जिसमें 11 लोगों की जान चली गई, कि गुरुवार (6 नवंबर) को एक और ऐसी खबर आई जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
बिलासपुर रेल हादसा: 48 घंटे बाद फिर वही लापरवाही! एक ही ट्रैक पर 3 ट्रेनें, बाल-बाल बचीं सैकड़ों जानें!
यह कोई छोटी-मोटी चूक नहीं थी। यह रेलवे के सुरक्षा दावों पर एक बड़ा तमाचा है।
खबर है कि बिलासपुर रेल मंडल में ही, एक ही रेलवे ट्रैक पर तीन-तीन ट्रेनें आ गईं। जी हाँ, आपने सही पढ़ा—एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन ट्रेनें एक ही पटरी पर मौत का खेल खेलने को तैयार थीं।
हुआ क्या था ?

- यह दिल दहला देने वाली घटना बिलासपुर रेल मंडल के कोटमीसोनार और जयरामनगर स्टेशनों के बीच हुई।
- हुआ यूँ कि एक ही ट्रैक पर दो मालगाड़ियाँ और एक पैसेंजर ट्रेन (यात्री गाड़ी) एक साथ आ गईं।
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, पैसेंजर ट्रेन दो मालगाड़ियों के बीच फंसी हुई थी।
- यह मंजर किसी बुरे सपने से कम नहीं था। सैकड़ों यात्रियों की जान एक धागे से लटकी हुई थी।
सोचकर ही रूह कांप जाती है कि अगर किसी भी एक लोको पायलट (ड्राइवर) ने जरा भी देरी की होती या उसे स्थिति का अंदाजा न लगा होता, तो हम एक और भयावह मंजर देख रहे होते।
सिर्फ 48 घंटे पहले का वो मंजर…
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह घटना ठीक उस समय हुई है जब बिलासपुर दो दिन पहले ही एक बड़े रेल हादसे का गवाह बना था।

मंगलवार, 4 नवंबर को, एक MEMU पैसेंजर ट्रेन ने लाल सिग्नल तोड़ते हुए एक खड़ी मालगाड़ी को पीछे से टक्कर मार दी थी। उस टक्कर में 11 निर्दोष लोगों की जानें गईं और दर्जनों लोग घायल हुए। उस हादसे की जांच अभी चल ही रही थी कि यह नई लापरवाही सामने आ गई।
रेलवे प्रशासन पर उठते गंभीर सवाल ?

यह घटना “तकनीकी खराबी” कहकर टाली नहीं जा सकती। यह सीधे-सीधे एक बड़ी संचालन (Operational) विफलता है।
- सिग्नलिंग सिस्टम का क्या हुआ ? हमारा आधुनिक सिग्नलिंग सिस्टम एक ही ट्रैक पर तीन ट्रेनों को आने की इजाजत कैसे दे सकता है ?
- मानवीय चूक या सिस्टमिक फेलियर ? क्या यह किसी एक कर्मचारी की गलती थी, या पूरा सिस्टम ही चरमरा गया है ?
- क्या कोई सबक नहीं लिया गया ? 4 नवंबर के हादसे के बाद भी इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो सकती है? क्या रेलवे प्रशासन ने सुरक्षा को लेकर कोई आपातकालीन कदम नहीं उठाए ?
“बाल-बाल बचे” पर कब तक ?
गनीमत रही कि इस बार कोई टक्कर नहीं हुई और सैकड़ों यात्रियों की जान बच गई। लेकिन हम कब तक “गनीमत रही” और “बाल-बाल बचे” जैसे शब्दों पर निर्भर रहेंगे ?
यह घटना रेलवे के लिए एक अंतिम चेतावनी (Final Wake-up Call) होनी चाहिए। 4 नवंबर का हादसा एक त्रासदी थी, और 6 नवंबर की यह घटना एक त्रासदी होते-होते बची है ।
यात्रियों की सुरक्षा को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अब सिर्फ जांच समितियों और निलंबन (Suspension) से काम नहीं चलेगा। जो भी इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार है, उस पर कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटना दोबारा कभी न हो।



